आनेवाले भीषणकालमें आपकी सामाजिक प्रतिष्ठा, आपके धन, ऐश्वर्य या उच्च प्रतिष्ठित लोगोंसे अच्छे सम्बन्ध आपका रक्षण करनेमें असमर्थ होंगे, ऐसेमें मात्र और मात्र भगवान ही आपको सभी प्रकारसे संरक्षण देनेका सामर्थ्य रखते हैं…..
जब कोई व्यक्ति स्वयंकी कोई वैयक्तिक इच्छापूर्ति हेतु या स्वयंकी आध्यात्मिक प्रगति हेतु साधना करता है तो उसे व्यष्टि साधना कहते हैं एवं जब समाजको धर्मके मार्गपर प्रवृत्त करने हेतु या समाजको सूक्ष्म जगतकी अनिष्ट शक्तियोंके आक्रमणसे रक्षण…..
प्रत्येक व्यक्ति समष्टि साधना नहीं कर सकता है एवं इस साधना हेतु कुछ विशेष गुण अवश्य ही होने चाहिए । समष्टि साधना करते समय भिन्न प्रकारकी अडचनोंका सामना करना पडता है……
स्वयंकी रुचि-अरुचिको अत्यधिक प्रधानता देना, अपने मनके अनुसार वर्तन करना, धर्मकी अपेक्षा काम और अर्थको अधिक प्रधानता देना, अपनी अहंकी पुष्टिमें सदैव लित्प रहना, इन सबसे मनके संस्कार और तीव्र होते हैं एवं नूतन इच्छाओंका जन्म होता है; इससे जीवनमें कभी भी शान्ति एवं संतुष्टि नहीं आती है !
समष्टि साधना करनेसे समाज धर्माभिमुख होता है, इसलिए हम द्रुत गतिसे आध्यात्मिक प्रगति करते हैं; इसलिए इस साधनाको करते समय सूक्ष्म जगतकी अनिष्ट शक्तियोंका आक्रमण होता है……
कलियुगमें सर्व सामान्य मनुष्यकी वृत्ति तमोगुणी होगी, ऐसा हमारे द्रष्टा सन्तोंने अनेक धर्मग्रन्थोंमें कहा है । तमोगुणी व्यक्ति स्वार्थी होता है, वह अपने और अधिकाधिक अपने परिजनोंकी स्वार्थसिद्धिमें ही लिप्त रहता है……
प्रारब्धके तीन प्रकार होते हैं, साधारण, मध्यम एवं तीव्र ! जहां साधारण प्रारब्ध अर्थात जब जीवनमें दुःखका प्रमाण अत्यल्प हो तो तीव्र साधना करनी चाहिए वहीं मध्यम प्रारब्ध अनुसार जब सब कुछ संघर्ष करनेपर प्राप्त होता हो तो ऐसेमें सन्त या गुरु कृपा पानेका प्रयास करना चाहिए । सन्त कृपासे प्रारब्ध सुसह्य हो जाता है, […]
कलियुगके आरम्भ होनेके पश्चात अनेक अवैदिक या अहिन्दू धर्मोंका (मानव निर्मित या स्थापित होनेके कारण वस्तुतः ये पन्थ हैं) जन्म हुआ, इन सभी पन्थोंका एक ही उद्देश्य है हिन्दू धर्मका नाश करना……
पूर्वके कालमें लोगोंकी वृत्ति सात्त्विक होनेके कारण उनके सर्व कृत्य सात्त्विक होते थे और उन्हें जब भी धर्म सम्बन्धी कुछ आचार या शास्त्र बताया जाता था तो वे उसे बिना तर्क किए, गुरु या धर्मशास्त्रोंपर विश्वास कर उसे किया करते थे………
आज अधिकांश माता-पिता अपने बच्चोंको साधनासे इसलिए दूर रखते हैं, क्योंकि उन्हें भय होता है कि कहीं वह पूर्ण कालिक साधक या संन्यासी न बन जाएं । ऐसे स्वार्थी माता-पिताको अपने बच्चोंके प्रारब्धकी तीव्रताके कारण जीवन पर्यन्त दुःख, तनाव एवं क्लेशमें रहना पडता है, क्योंकि एक आसक्त पालकके लिए अपने बच्चोंका कष्ट सबसे अधिक असह्य […]