अध्यात्म एवं साधना

क्यों करें अखण्ड नामस्मरण ? (भाग – १२)


ध्यान रखें, सूक्ष्म मनको हम और किसी भी माध्यमसे नियन्त्रित नहीं कर सकते हैं, इस हेतु कोई सूक्ष्म शस्त्र ही चाहिए और वह सूक्ष्म शस्त्रका एक माध्यम है, नामजपरुपी साधना । अनेक विचारोंमें रमण करनेवाले हमारे मनद्वारा…..

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क्यों करें अखण्ड नामस्मरण ? (भाग – ११)


कुछ लोग कहते हैं कि मेरी नामजपके प्रति श्रद्धा नहीं है; इसलिए मैं इसे नहीं करता हूं । जैसे हम यदि कभी रुग्ण होते हैं और जिस चिकित्सकसे हम सदैव अपनी चिकित्सा करवाते हैं, उनसे यदि हमें कोई लाभ नहीं…..

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क्यों करें अखण्ड नामस्मरण ? (भाग – १०)


ईश्वर गुप्त हैं; किन्तु उनका नाम सर्वविदित है । नामस्मरणके कारण निर्गुण निराकार ईश्वरको साकार रूपमें प्रकट होना पडता है और इसी सगुण भक्तिकी पराकाष्ठा है, निर्गुण ब्रह्मसे एकरूप होना ! अनेक लोगोंको यह लगता…..

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साधना हेतु मोहत्याग आवश्यक


मायाके मोहसे कभी भी निकलना बहुत कठिन होता है । जिन्हें आज अपने पुत्र और पुत्रियोंके शिक्षा और विवाहकी इतनी चिन्ता है कि वे वर्तमान समयमें थोडा भी समय ईश्वरके लिए नहीं निकाल सकते हैं तो क्या….

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क्यों करें अखण्ड नामस्मरण ? (भाग – ९)


नामस्मरण सहज अवस्थाकी साधना है, अतः यह सभीके लिए करना सरल है । इसमें किसी भी प्रकारका देश, काल इत्यादिका बन्धन नहीं है । हम नामजप कभी भी, कहीं भी और किसी भी अवस्थामें कर सकते हैं । ईश्वरने ही देश, काल, देह……

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क्यों करें अखण्ड नामस्मरण ? (भाग – ८)


कलियुगमें तमोगुणका साम्राज्य होता है, इसकारण अनेक बार ध्यानमार्गी, ज्ञानमार्गी एवं कर्मयोगसे साधना करनेवाले जीवकी बुद्धि भी भ्रष्ट हो जाती है और वह योगभ्रष्ट या पथभ्रष्ट हो जाता है । कलिके इस प्रभावसे बचने हेतु आप जिस भी योगमार्गसे साधना करते हों, उस साधनाको नामस्मरणसे जोड दें, इससे साधनामें अखण्डता बनी रहेगी एवं ईश्वरसे अनुसन्धान […]

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समष्टि साधना सम्बन्धी दृष्टिकोण (भाग – ८)


चूंकि समष्टि साधनाका महत्त्व कलियुगके अन्ततक रहनेवाला है; इसलिए यह साधना करने हेतु अपने दोषोंको न्यून करना अति आवश्यक है, विशेषकर ऐसे दोषोंको जिससे समष्टिको हानि पहुंचती हो……

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वाङ्मयीन तपके अभावमें आजके हिन्दुओंमें व्याप्त हुई बुद्धिभ्रष्टता


वाङ्मयीन तप रूपी इस विशिष्ट अलंकारको धारण करनेके अभावमें आजके हिन्दुओंमें व्याप्त हुई है बुद्धिभ्रष्टता  निधर्मी शिक्षण पद्धति मात्र और मात्र धन अर्जित करना सिखाती है; परिणामस्वरूप सम्पूर्ण जीवन मनुष्यका लक्ष्य इसीपर केन्द्रित रहता है । प्रथम विद्यार्थी जीवनमें कैसे अधिकसे अधिक धन अर्जित किया जा सके ?, मात्र उस हेतु शिक्षा ग्रहण करना, उसके […]

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समष्टि साधना सम्बन्धी दृष्टिकोण (भाग – ७)


पृथ्वीपर समष्टि साधनाका महत्त्व इतना अधिक है कि उच्च लोक जैसे महर्लोक एवं जनलोककी जीवनमुक्त दिव्यात्माएं, इस धरापर धर्मकार्य करने हेतु जन्म लेती हैं एवं एक जन्ममें सूक्ष्म लोकोंमें की जानेवाली कोटि-कोटि वर्षोंकी साधना जितना लाभ प्राप्त कर….

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आइए करें अपने दोषोंका अभ्यास (भाग – १)


चूकें तीन स्तरपर होती हैं – वृत्ति (मनके स्तरपर), वाचा (बोलनेके स्तरपर) और कर्म (कृतिके स्तरपर) । यदि आप अन्तर्मुख हैं तो आपको स्वयंको तीनों ही स्तरकी चूकें ध्यानमें आएंगी ! सामान्य व्यक्तिसे प्रतिदिन इन तीनों स्तरपर…..

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