अ. कुछ लोग कहते हैं कि मुझसे कोई चूक (गलती) होती ही नहीं है; अतः मैं अपनी चूकें कैसे लिखूं ? दृष्टिकोण : जब तक मनका पूर्ण लय नहीं होता तब तक विषय-वासनाओंके संस्कार रहते ही हैं और पूर्ण मनोलयवाले सन्त सम्पूर्ण विश्वमें जितनी हमारी अंगुलियां है उतने भी नहीं हैं । मनके संस्कारोंका प्रकटीकरण […]
स्वयंके आध्यात्मिक स्तरके बारेमें जाननेके पश्चात कुछ साधकोंको लगता है कि मेरा आध्यात्मिक स्तर तो कम है, ऐसेमें ईश्वरीय कार्यका माध्यम मैं कैसे बन पाऊंगा ? ऐसे साधकोंने अपने भीतर ऐसी हीन भावना नहीं आने देना चाहिए……
अनेक साधकोंके घर जब उनके सदस्योंके कष्टमें बहुत वृद्धि होने लगती है, तब उनसे वे क्या साधना करवा सकते हैं ?, यह पूछते हैं । ध्यान रहे, जैसे आग लगनेपर कुंआ नहीं खोदा जाता है, उसीप्रकार कष्टके तीव्र होनेपर साधना आरम्भ करना अत्यधिक कठिन होता है; इसलिए जब काल अनुकूल हो तभी साधना आरम्भ करें […]
सन्त-महापुरुषोंके संगसे पाप-ताप सब नष्ट होते हैंं और अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है । सन्त शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदासजी रामचरितमानसमें सन्त सान्निध्यका महत्त्व बताते हुए कहते हैं – शठ सुधरहिं सतसंगति पाई । पारस परस कुधात सुहाई ।। अर्थात जैसे पारसके स्पर्शसे लोहा सोना बन जाता है, वैसे ही सत्संगतिमें दुष्ट भी सुधर जाते हैं । […]
‘श्री गुरुदेव दत्त’का जप करने हेतु हमारी संस्था कहती है; इसलिए अनेक दत्त भक्तोंको लगता है कि हम दत्त सम्प्रदायसे हैं; किन्तु ऐसा है नहीं है । हम विशुद्ध वैदिक सनातन धर्मका प्रसार करते हैं…..
मन्त्रजप और नामजपमें मुख्य भेद यह है कि नामजप यदि अयोग्य रीतिसे या अनुचित उच्चारणसे किया जाए तो भी उसका कोई विपरीत प्रभाव नहीं पडता है अपितु यदि नामजप भावपूर्वक किया जाए और उसमें कोई चूक हो तो भी (वाक्य अधूरा है) जान आदिकबि नाम प्रतापू । भयउ सुद्ध करि उलटा जापू ॥ सहस नाम […]
मृत्यु अनिश्चित है, वह कब आएगी ?, यह ज्ञात नहीं होता और मृत्यु वृद्धावस्था आनेपर ही आएगी, ऐसा भी नहीं है । आए दिन हम अनेक लोगोंकी अकाल मृत्युके समाचार सुनते ही रहते हैं……
कुछ लोग सांसारिक पद पाने हेतु सतत प्रयत्नशील रहते हैं, जबकि वह क्षणभंगुर होता है । यदि पद पानेका ही कोई अभिलाषी है तो उसने शाश्वत पद पानेका प्रयास करना चाहिए । साधना कर आत्मप्रकाशी बनकर, व्यक्ति शाश्वत पदका……
कुछ समय पूर्व एक विवाहित स्त्री मुझसे मिली और उन्होंने कहा, “कुछ माह साधना करनेके पश्चात अब मुझे, मेरेद्वारा इसी जन्ममें किए गए पापोंका स्मरण होने लगा है, मैंने दो बार अनचाहे गर्भ ठहरनेपर उसका गर्भपात करवाया है,” इसीप्रकार एक व्यक्तिने मुझसे कहा, “मैं एक ऐसे शासकीय(सरकारी) पदपर हूं जहां बहुत ही सरलतासे उत्कोचका (घूसका) […]
सर्वसामान्य हिन्दूको आज योग्य प्रकारसे धर्मशिक्षण नहीं मिलनेके कारण उसकी वृत्ति बहिर्मुख हो चुकी है और ऐसे व्यक्ति मात्र सांसारिक भोगमें अपने सुख और शान्तिके साधनको ढूंढते है और इसी क्रममें उसका सम्पूर्ण जीवन निकल जाता है……