पेड-पौधे, मिट्टी, प्रकाश और हवासे अपना भोजन आप ही बना लेते हैं; परन्तु पशु और मनुष्य अपना भोजन हेतु या जीवित रहने हेतु वनस्पति या दूसरे जीव-जंतुओंपर निर्भर रहते हैं । प्रकृतिने दो प्रकारके पशु बनाए हैं, शाकाहारी और मांसाहारी…..
इस जन्ममें या अगले जन्ममें हमारेद्वारा किया गया अधर्म ही हमारे दुखोंका मूल कारण होता है; इसलिए ऐसा कोई भी कर्म नहीं करना चाहिए कि हमें दुःख भोगना पडे; क्योंकि दुःखकी कल्पना कोई नहीं…..
हमारी कुटुम्ब व्यवस्थाका मूल आधार साधकत्व था, जहां दूसरोंकी इच्छाको प्रधानता देते हुए कुटुम्बके प्रत्येक सदस्य साधना एवं धर्माचरण करते हुए प्रेम एवं सौहार्दसे रहते थे । पूर्व कालमें एक गृहमें सौ सदस्योंका कुटुम्ब प्रेमपूर्वक, इसी साधकत्वके कारण…..
कल हमने व्यष्टि और समष्टि साधनाके विषयमें जानकारी प्राप्त की थी और आपको बताया था कि हमें समष्टि प्रार्थना कैसे करनी है, यह बताएंगे तो आजसे अगले कुछ दिवस ऐसे ही कुछ प्रार्थनाओंके विषयमें जानेंगे …..
दुःखकी बात यह है कि जगतमें क्रूर मनुष्य नाना प्रकारके पवित्र खाद्य पदार्थोंको छोडकर आततायी राक्षसकी भांति मांसके लिए लालायित रहते हैं तथा भांति-भांतिके मिष्टान्न (मिठाइयों), भिन्न प्रकारके शाकों, खाण्डकी बनी हुई……
मांस क्रय करनेवाला धनसे प्राणीकी हिंसा करता है, खानेवाला उपभोगसे करता है और मारनेवाला मारकर और बांधकर हिंसा करता है, ये तीन प्रकारके वध ही हैं । जो मनुष्य मांस लाता है, जो अनुमति देता है या मंगाता है, जो पशुके अंग काटता है…….
मांसाहारको एक निन्दनीय कृत्य मानकर हमारे धर्मग्रन्थोंने उसे पापकर्म माना है एवं उसमें लिप्त प्रत्येक व्यक्ति किसप्रकार पापके अधिकारी बनते हैं, इस सम्बन्धमें मनुस्मृतिका यह श्लोक उल्लेखनीय…..
मांसाहार न करनेसे होनेवाले लाभ बहुत अधिक हैं, विशेषकर जो अध्यात्ममें आगे जाना चाहते हैं या अपना परलोक सुधारना चाहते हैं, उन्होंने जिह्वाके वशमें आकर जीव हत्याकर मांसाहार नहीं करना चाहिए….
हमारे लेखोंके कुछ पाठक या साधक मुझसे कहते हैं कि कुछ लोग आपके लेखोंको अपने नामसे अन्य गुटमें पोस्ट कर रहे हैं, मैंने कहा, “कोई बात नहीं है, वह मेरे लेखोंमें अपना नामसे डालकर मात्र अपने अहंकारकी……
अल्पायुसे ही साधना करनेसे पूर्व जन्मोंके संस्कारका नष्ट होना : अल्पायुसे ही साधना आरम्भ करनेपर इस जन्मके नूतन संस्कार चित्तमें अंकित नहीं हो पाते हैं; क्योंकि साधना नूतन संस्कारोंको अंकित नहीं होने देती है । ऐसेमें साधनाकी अखण्डता रहनेपर चित्तमें जो पूर्व जन्मके संस्कार होते हैं, वे भी नष्ट हो जाते हैं, इसप्रकार वृद्धावस्था आनेतक […]