हमारा मन अशांत क्यों रहता है ?; क्योंकि चित्तपर अनेक जन्मोंके असंख्य संस्कार होते हैं । जैसे-जैसे आयु बढती है, संस्कारोंके केन्द्र एवं अन्य संस्कार भी बढते जाते हैं । जैसे एक पांचवी कक्षाका विद्यार्थी जब नामजप करने बैठेगा, तब…..
मृत्यु निश्चित है; परन्तु उसके आगमनका समय हमें ज्ञात नहीं होता । मृत्यु कभी भी आ सकती है; अतः मैं बुढापेमें साधना करूंगी/करूंगा, इसप्रकारका दृष्टिकोण पूर्णत: त्रुटिपूर्ण है । मनुष्य जीवनके दो उद्देश्य हैं – पहला, प्रारब्धको भोगकर……
वस्तुत: साधना जितनी शीघ्र आरम्भ कर सकें उतना ही अच्छा होता है । विद्यार्थी जीवनमें मनकी एकाग्रता और आत्मनियन्त्रण (ब्रह्मचर्य), यह दोनों साध्य करनेके लिए आत्मबल आवश्यक होता है । यह साधनाद्वारा ही प्राप्त किया जा……
योगीकी वृत्ति अन्तर्मुखी और भोगीकी वृत्ति बहिर्मुखी होती है ! भोगमें योगका समन्वय करना सीखकर, एक गृहस्थ अंतर्मुखी हो सकता है । अन्तर्मुखी होने हेतु अपना नित्य आत्मपरीक्षण कठोरता एवं तटस्थतासे करें । कोई भी प्रिय या अप्रिय प्रसंग निर्माण होनेपर मेरी वृत्ति कैसी थी ?, इसकी समीक्षा उसी क्षण स्वयं करना चाहिए । किसी […]
कलियुगी जीवके जीवनमें प्रारब्धकी तीव्रता अधिक होनेके कारण कष्टका या दुःखका प्रमाण अधिक होता है । अन्य युगोंकी अपेक्षा धर्मके तीन अंगोंका पतन हो जानेके कारण सामान्य व्यक्ति धर्म एवं साधनाको इतना महत्त्व नहीं देता; अतः……
धनके प्रति अत्यधिक आसक्ति होनेके कारण धनका त्याग करना सर्वाधिक कठिन होता है । पूर्णत्व प्राप्त सन्तोंने अपने सर्वस्वका त्याग किया होता है; इसलिए उनके आंगनमें अष्ट महासिद्धियां खेलती हैं !
अधिकांश कलियुगी जीव मूलतः तमोगुणी होते हैं, ऐसेमें ज्ञानयोग, कर्मयोग, ध्यानयोग, क्रियायोग इत्यादिकी साधना करना उनके लिए कठिन होता है । भक्तियोग कलियुगी जीवके लिए सरल योगमार्ग है; क्योंकि तमोगुणी वृत्तिके व्यक्ति भी इस……
‘सन्तोंके आश्रमका अन्न बासी नहीं होता हैं’, इस लघु लेखके सम्बन्धमें एक पाठकने लिखकर भेजा है कि त्रिगुणातीत सन्त दुर्लभ होते हैं ! यह सत्य है कि ऐसे सन्त दुर्लभ होते हैं; किन्तु आज भी ऐसे सन्तोंके कारण ही यह पृथ्वी इतने पापियोंका भार सहते हुए भी टिकी हुई है, यह कदापि नहीं भूलना चाहिए […]
हमसे कोई चूक हो और हम उसे स्वीकार नहीं कर पाते हों और उसके लिए या तो दूसरेको दोषी ठहराते हैं या मैं कैसे दोषी नहीं हूं ?, इस सम्बन्धमें अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते……
कुछ लोग सन्तोंके आश्रमके अन्नको बासी(एक रात्रि पूर्व बना हुआ खाद्य पदार्थ) कहकर नहीं खाते हैं । सन्तोंके आश्रमका अन्न भिक्षामें (दानमें) प्राप्त होता है; इसलिए वह अन्न प्रसाद स्वरूप होता है । बासी अन्न तमोगुणी होता है; अतः सामान्य घरोंमें जो अन्न रात्रिमें रखा रहता है, वह बासी कहलाता है । सामान्य गृहस्थोंके घरकी […]