नववर्ष प्रारम्भ जैसा कि नामसे ही सिद्ध होता है उसका अर्थ है नूतन वर्षका शुभारम्भ; किन्तु प्रतिवर्ष १ जनवरीको पाश्चात्य संस्कृतिसे प्रभावित लोगोंद्वारा मनाया जानेवाला तथाकथित नववर्ष इसके विपरीत प्रतीत होता है; क्योंकि इसमें नूतन कुछ नहीं होता । आध्यात्मिकताविहीन तथा केवल भौतिकताके विकृत प्रदर्शनका प्रतीक बन चुके, इस दिवसको उत्सवके रूपमें मनाना पूर्णतः अनुचित […]
हिन्दुओ ! हिन्दी भाषाके शुद्ध उच्चारण सीखकर बोलनेका अभ्यास करें ! आज हिन्दीभाषिक राज्योंमें ही वहांके रहनेवाले विशुद्ध हिन्दी नहीं बोल पाते हैं तो शेष भारतमें विशुद्ध हिन्दीके उच्चारणकी हम अपेक्षा भी कैसे कर सकते हैं ? हमारे धर्मशास्त्रोंमें भाषाके प्रत्येक अक्षरका ही नहीं; अपितु वर्णोंके उच्चारणका विशेष महत्त्व बताया गया है । महर्षि पाणिनि, […]
यूरोप धर्मयात्राके मध्य मैंने पाया कि वहांके लोगोंमें स्वभाषाभिमान कूट-कूटकर भरा हुआ है । वहां अंग्रेजी भाषाको लोग निकृष्ट दृष्टिसे देखते हैं और अपनी मातृभाषा भाषा बोलनेमें गर्व अनुभव करते हैं । वहीं स्वभाषाभिमानरहित भारतीय हिन्दू जो वहां रह रहे हैं, वे अपनी सन्तानोंको अपनी भाषा बोलना, पढना और लिखना नहीं सिखा पाते हैं और […]
हमारी वैदिक संस्कृति सत्त्वगुण आधारित है; किन्तु धर्मशिक्षणके अभावमें आज हिन्दुओंको सत्त्व, रज और तमका सिद्धान्त ज्ञात न होनेके कारण वे अपनी दिनचर्यामें भाषा, आचार, भोजन, सब कुछ तमोगुणी करने लगे हैं । जैसे आजकी स्त्रियां ‘अनारकली पद्धति’की सलवार-कुर्ती पहनती हैं । क्या उन्हें ज्ञात नहीं कि ‘अनारकली’ कौन थी एवं उसकेद्वारा धारण किए हुए […]
जननी और जन्मभूमि है स्वर्गसे भी महान आज अनेक हिन्दू मात्र क्षणिक सुखप्राप्ति हेतु मलेच्छोंके देशके बाहरी ऐश्वर्यसे आकर्षित होकर, भारत जैसे आध्यात्मिक देशका परित्याग कर देते हैं । विदेशमें न तो आध्यात्मिक दृष्टिसे पोषण होता है और न ही लौकिक दृष्टिसे कुल, गोत्र, प्रवरकी कोई परम्परा रह पाती है अर्थात वहां स्थायी निवास करनेपर […]
भारतमें कुछ समय पहलेतक पशुओंके लिए कृत्रिम गर्भाधान केन्द्र होते थे, अब मनुष्योंके लिए भी कृत्रिम गर्भाधान केन्द्र सर्वत्र कुकुरमुत्तेके समान पसरने लगे हैं । धर्मविहीन पाश्चात्य देशोंमें विवाह जैसी संस्थाके उध्वस्त होनेसे वहां अब अनौरस सन्तानोंकी संख्या ४० % से अधिक हो गई है । अब तो भारतमें भी ‘डोनर एग’ और ‘डोनर स्पर्म’ […]
आजकी पीढीको चरित्र रक्षणके विषयमें बाल्यकालसे ही संस्कारित नहीं किया गया; फलस्वरूप आजकी युवा पीढीका चारित्रिक पतन इस देशके सामाजिक शास्त्रियोंके लिए चिन्ताका विषय बन चुका है । शास्त्र कहता है – यथा हि मलिनै: वस्त्रै: यत्र कुत्र उपविष्यते । वॄतत: चलितोपि एवं शेषं वॄतं न रक्षति ।। अर्थात जिसप्रकार मैले वस्त्रवाले कहीं भी बैठ जाते […]
हिंदुओंको छोडकर अन्य सभी धर्म एवं पंथके अनुयायी अपनी सन्तानोंको धर्मशिक्षण देने हेतु प्रयत्नशील रहते हैं ! मात्र आज अधिकांश हिन्दु माता-पिता अपने बच्चोंको…..
वर्तमान समयमें घरमें सजावट करने हेतु प्लास्टिकके या अन्य कृत्रिम पदार्थके पुष्पोंका उपयोग बढ रहा है । कृत्रिम पुष्पमें न ही देवत्त्व आकृष्ट करनेकी क्षमता होती है और न ही उससे वास्तुकी शुद्धि होती है, इसके विपरीत कृत्रिम पुष्प मृतवत होनेके कारण, घरमें अनिष्टकारी शक्तियोंको आकृष्टकर घरके वास्तुको अपवित्रकर, घरमें काली शक्तिका प्रक्षेपण करते हैं […]
जन्मदिन दिनांक अनुसार मनाते हैं, तिथि अनुसार नहीं ! तिथि अनुसार जन्मदिन मनाने से उस दिन हमारे सभी सूक्ष्म देहके द्वार आशीर्वाद हेतु खुल जाते हैं….