कुछ पाठकोंने व्हाट्सएपपर हमारे लेखोंको पढनेके पश्चात् पूछा है कि वे अपने जीवन प्रणालीको सात्त्विक कैसे बनाएं ? इस प्रश्नके समाधान हेतु यह लेख श्रृंखला आरम्भ कर रहे हैं – योग्य प्रकारसे धर्माचरण एवं साधनाको अंगीकृत करनेसे ही हम सात्त्विक बन सकते हैं, सात्त्विक रहनेसे हमारे जीवनमें सुख, शान्ति, समृद्धि एवं देवकृपा सब कुछ प्राप्त […]
कुछ समय पूर्व एक वृद्ध कर्मकाण्डी सन्तका हमारे देहली आश्रममें पदार्पण हुआ। उनके आश्रममें प्रवासके मध्य एक साधकके यहां एक वैयक्तिक कार्यक्रम अंतर्गत भोजमें (लंच पार्टी) उन्हें भी हम ले गए क्योंकि उस साधक कुटुंबकी और पूज्य बाबाकी इच्छा थी। भोजका आयोजन एक खुले मैदानमें था। भोजसे आनेके पश्चात् मुझे उन संतने अपना आश्चर्य व्यक्त […]
वृत्त प्रकाशित हुआ है कि देशमें बाघोंकी संख्यामें ६% की वृद्धि हुई है । किंचित सोचें ! यदि उनकी संख्यामें अधिक वृद्धि हो गई तो क्या होगा ? स्वतन्त्रता पश्चात् इस देशमें जितना संरक्षण बाघोंको दिया गया है, उतना ही संरक्षण यदि देसी गोवंशको दिया जाता तो आज इस देशकी अर्थव्यवस्था, समाजका स्वास्थ्य, पर्यावरण, कृषि […]
धर्मयात्राके मध्य जब मैं विदेशमें अनेक देशोंमें गई तो मात्र शोध हेतु वहांके सुप्रसिद्ध विपणि (बाजारों) को देखने हेतु गई कि सम्पूर्ण विश्वके लोग और विशेषकर भारतके हिन्दू वहां क्यों वस्तु क्रय करने हेतु जाते हैं ? मैं तो वहांके ‘बाजार’, हाट या ‘मॉल’में मात्र बीस मिनिटोंमें ही मैं थककर चूर हो जाती थी क्योंकि […]
अ. स्वैराचारको प्रोत्साहन देनेवाली एक कुप्रथा है वैलेंटाइन डे (१४ फरवरी) मनाना वैलेंटाइन डे पाश्चात्य संस्कृतिके अन्धे अनुकरणसे प्रेरित एक विकृत कुसंस्कार है, जिसकारण युवा पीढी अपनी नैतिकताको ताकमें रख, भोगवादकी ओर प्रवृत्त हो रही है । स्वैराचारको प्रोत्साहन देनेवाला यह दिवस, उच्छ्रंखलताका द्योतक बन, युवा वर्गको अपनी सभ्य एवं सुसंस्कृत वैदिक संस्कृतिकी मर्यादाको भंग […]
स्वतन्त्रता पश्चात हमारे राज्यकर्ता इस देशकी प्रतिष्ठाको बचाने हेतु कभी प्रयत्नशील नहीं रहे; क्योंकि शास्त्र कहता है, ‘भारतस्य प्रतिष्ठे द्वे संस्कृतम् संस्कृतिस्तथा’ अर्थात भारतकी प्रतिष्ठा दोमें निहित है, संस्कृति और संस्कृत । यह सर्व विदित है कि इस देशके राज्यकर्ताओंने संस्कृत भाषाको एक षड्यन्त्र अन्तर्गत इस देशकी प्रजासे विमुख रखा; क्योंकि उन्हें ज्ञात था कि […]
विदेशी संस्कृतिसे प्रभावित एवं विदेशमें रहनेवाले एक जन्म हिन्दूने पूछा है कि आप पाश्चात्योंको म्लेच्छ क्यों कहती हैं ? इसके कुछ कारण इसप्रकार हैं – १. वे मल-मूत्र त्यागने या भोजन करनेके पश्चात् जलकी अपेक्षा कागदसे स्वच्छता करना, अधिक उचित समझते हैं और इसको वे सभ्य समाजका प्रतीक समझते हैं । २. अनेक दिवसोंतक वे […]
स्वतन्त्र भारतके सात दशकोंकी एक ‘उपलब्धि’ यह भी है कि आजतक इस देशके सभी राज्योंके लोग राष्ट्रभाषा हिन्दी न ढंगसे बोल पाते हैं, न लिख पाते हैं और न ही पढ पाते हैं ! दक्षिण भारतमें तो राजनीतिज्ञोंकी कुत्सित मानसिकताके कारण वहांके अनेक लोगोंद्वारा हिन्दी भाषाको घृणाकी दृष्टिसे देखा जाता है । आजके सत्तालोलुप एवं […]
आइए सीखें ! संस्कृतनिष्ठ हिन्दी वर्तमान कालमें प्रायः हम हिन्दी बोलते अथवा लिखते समय सहज ही उर्दू एवं अन्य विदेशी भाषाओंसे उद्धृत शब्दोंका प्रयोग करते रहते हैं । वैदिक संस्कृति सत्त्व गुण आधारित है एवं संस्कृतनिष्ठ हिन्दी ही सात्विक भाषा है । उर्दू एवं अन्य विदेशी भाषाओंसे उद्धृत शब्दोंका प्रयोग करनेसे हमारी हिन्दी भाषाकी सात्त्विकता […]
वैदिक उपासना पीठके आश्रममें पिछले तीन वर्षोंसे देश-विदेशके अनेक पुरुष दस-पन्द्रह दिवस सेवाके लिए आते रहे हैं । मैंने इनमेंसे जिस भी युवा पुरुषको आश्रमसे ७०० मीटरकी दूरीपर स्थित मण्डीसे आठ-दस किलो तरकारी लाने हेतु कहा है, तब-तब सभी पुरुषोंका एक ही कहना रहा है, ” चलकर और हाथमें तरकारी लेकर इतनी लम्बी दूरी कैसे […]