संस्कार, संस्कृति एवं भाषा

ईश्वरसे छल करनेवाली स्त्रियां नरकगामी है !


आजकी कुछ मूढ महिलाएं अयप्पा मन्दिरमें अपनी बाह्य वेशभूषा परिवर्तितकर जाती हैं और उन्हें लगता है कि वे ऐसा कर स्त्री जातिके उद्धारका कार्य कर रही हैं ! भगवानके सामने छल करनेवाली स्त्रियां, अपने लिए नरकका द्वार खोलती…..

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अपने बच्चोंमें सात्त्विक संस्कार कैसे अंकित करें ? (भाग – ५)


सूर्योदयसे पूर्व उठना शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य दोनोंके लिए लाभकारी होता है; अतः यह संस्कार बच्चोंमें अवश्य डालनेका प्रयास करना चाहिए । अब तो वैज्ञानिकोंने भी यह शोधकर बता दिया है कि प्रातः शीघ्र उठनेवालोंकी मेधा शक्ति…….

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अपने बच्चोंमें सात्त्विक संस्कार कैसे अंकित करें ? (भाग – २)


शिशुके जन्म लेनेपर यदि शिशुमें अधिक शारीरिक कष्ट दिखाई दे तो उसकी मंगलवार और शनिवार नियमित तीन वर्षतक दृष्टि (नजर) उतारनी चाहिए एवं पांच वर्षतक, जब वह सो जाए, तो (उसके) सिरपर हाथ रखकर ‘ॐ श्री गुरुदेव दत्त…..

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तमोगुणी फटे वस्त्र क्रयकर धारण करनेवाले आजके विवेकशून्य हिन्दू


हिन्दुओंके इस बौद्धिक पतनको देखकर लगता है कि वह दिन दूर नहीं जब वे मात्र पाश्चात्योंका अन्धा अनुकरण करने हेतु नग्न होकर सर्वत्र घूमनेमें गर्व अनुभव करने लगें ! सत्य ही है, धर्मविहीन समाज विवेकशून्य, नीतिशून्य एवं संस्कारहीन  होकर पशुताकी और अग्रसर होता है !

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आजके ‘कलियुगी माता-पिता’ रखते हैं अपने बच्चोंको साधनासे दूर


पालको ! यदि ईश्वरने आपको सात्त्विक सन्तानें दी हैं तो उनकी सात्त्विक रीतिसे लालन-पालन करें एवं उन्हें धर्मपथपर अग्रसर कर अपने धर्मकर्तव्यका निर्वाह करें, उसीमें आपका और आपकी संतानका कल्याण निहित है।

 

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सात्त्विक जीवन प्रणाली कैसे करें व्यतीत ? (भाग – १५)


अ. वर्तमान समयमें साधना एवं धर्माचरणके अभावमें अधिकांश लोगोंको सूक्ष्म जगतकी अनिष्ट शक्तियोंका कष्ट है, ऐसेमें उनके जूठन ग्रहणसे (किसीका छोडा हुआ भोज्य पदार्थ) अनिष्ट शक्तियोंका कष्ट होनेकी आशंका रहती है । हाथोंके पोरोंसे सूक्ष्म शक्ति प्रवाहित होती है, यदि किसीको अनिष्ट शक्तियोंका कष्ट हो तो उसकेद्वारा ग्रहण किए हुए भोजनसे, जो हाथोंसे निकलनेवाली अनिष्ट […]

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धर्मधारा – सनातनी आर्योंके गुणसूत्रमें संस्कृत भाषा


इन्दौरके एक संस्कृतके विद्वानसे मैंने निवेदन करते हुए कहा की मुझे संस्कृत व्याकरण सीखना है विशेषकर लघुसिद्धान्तकौमुदी एवं पाणिनीय अष्टाध्यायी ! उन्होंने मुझसे कहा, “आपकी मासिक पत्रिका हमने पढी है, संस्कृत तो आपके गुणसूत्रमें (जींसमें) है….

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सात्त्विक जीवन प्रणाली कैसे करें व्यतीत ? (भाग – १४)


अ.हिन्दू धर्ममें हम भोजन करनेसे पूर्व प्रार्थना करते हैं और प्रार्थनाके पश्चात् वह आहार, महाप्रसाद बन जाता है, ऐसेमें उसे छूरी, कांटे-चम्मचसे ग्रहण करना, उसकी अवमानना करने समान है। अध्यात्मशास्त्र अनुसार भी पांचों अंगुलियोंके पोरोंसे प्रवाहित होनेवाले चैतन्य, हाथसे भोजन करनेपर उसमें समाविष्ट होनेके कारण, वह चैतन्ययुक्त एवं सुपाच्य हो जाता है। अध्यात्मशास्त्र आधारित संस्कृति […]

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सात्त्विक जीवन प्रणाली कैसे करें व्यतीत ? (भाग – १३)


अ. सात्त्विक व्यक्ति उचित एवं आवश्यकता अनुसार आहार लेता है। राजसिक व्यक्ति स्वादिष्ट भोजन तब तक लेता है, जब तक पेट भर न जाये और तामसिक व्यक्तिको अपनी जिह्वापर नियंत्रण नहीं होता है; अतः वे आवश्यकतासे अधिक भोजन करता है । इस शास्त्रवचन अनुसार अपनी प्रवृत्तिकी समीक्षा करें एवं सात्त्विक आचरण करना आरम्भ करें। आ. […]

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सात्त्विक जीवन प्रणाली कैसे करें व्यतीत ? (भाग – १२)


अ. आजकल अनेक व्यक्ति भोजन करते समय जूठन छोड देते हैं, वह एक प्रकारसे ब्रह्मरूपी अन्नका तिरस्कार करना है। भोजनमें मीनमेख(कमियां) निकालनेसे भी भोजनकी अवमानना होती है, जो प्राप्त हुआ है, उसे कृतज्ञताके भावसे ग्रहण करनेसे मनुष्यके सभी स्थूल एवं सूक्ष्म देहोंका पोषण होता है। भोजन, इस शरीरको स्वस्थ एवं सात्त्विक रखनेका एक माध्यम है […]

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