वर्तमान समय युवा वर्गमें विशेषकर आधुनिकतामें लिप्त रहनेवाले युवाओंमें मनोरोग एक महामारीके रूपमें फैल रहा है । इतना ही नहीं, प्रतिदिन कहीं न कहीं युवाओंद्वारा आत्महत्याके समाचार प्रकाशित होते रहते हैं, इनमेंसे अनेक तो उच्च शिक्षित होते हैं या ख्यातिप्राप्त विद्यालयों या महाविद्यालयों या विश्वविद्यालयोंमें शिक्षा ग्रहण कर रहे होते हैं । इनमेंसे अनेक अपनी […]
यदि कोई अंग्रेजी बोलनेवाला व्यक्ति प्रत्येक वाक्यमें चार हिन्दी और चार उर्दूके शब्द डालकर बात करे या उसकी अभिव्यक्तिमें व्याकरणकी अनेक चूकें हों तो लोग उन्हें हेय दृष्टिसे देखकर उनका उपहास करेंगे, नहीं, नहीं, प्रत्यक्षमें उपहास करते हैं !; किन्तु हिन्दी भाषामें दो वाक्य भी शुद्ध रीतिसे अर्थात संस्कृतनिष्ठ नहीं लिख पानेवाले स्वयंको आधुनिक और […]
पवित्रता और स्वच्छतामें बहुत अन्तर होता है । पवित्रता क्या है?, इसे समझने हेतु सूक्ष्म इन्द्रियोंका जागृत होना आवश्यक होता है । जैसे जब मैं विदेश गई तो मैंने देखा वहां अत्यधिक स्वच्छता है….
विदेशमें रहनेवाले हिन्दू, विदेशकी वस्तुओंकी शुद्धिकी प्रशंसा करते नहीं थकते, मुझे इससे यह समझमें आया कि अज्ञानतामें सचमें आनन्द है ! सात्त्विकताकी परिभाषासे अनभिज्ञ, आजका यह हिन्दू समाज मात्र स्थूल स्तरकी शुद्धिको ही सर्वश्रेष्ठ मापदण्ड मानते हैं, इससे समझमें आता है कि हिन्दुओंका आध्यात्मिक पतन कितने निचले स्तरतक हो गया है ! सत्त्व गुण आधारित […]
पूर्वकालमें स्त्रियों और पुरुषोंके मुखपर दिव्य तेज रहता था, आज उस तेजको लाने हेतु सभी रासायनिक सौन्दर्य प्रसाधनोंका उपयोग करते हैं या सौन्दर्यवर्धनालयमें जाते हैं । स्त्रियोंमें स्त्री सुलभ लज्जा, पाक-कला और गृह-सज्जामें निपुणता, निरपेक्ष वात्सल्य, चरित्रका संरक्षण एवं साधना तथा धर्मपालन हेतु अखण्डतासे किए जानेवाले प्रयत्नोंके कारण स्त्रियोंमें नैसर्गिक सुन्दरता एवं तेज होता था । […]
धारावाहिकोंमें या चलचित्रोंमें (फिल्मोंमें) देवी-देवताके पात्रका अभिनय करनेवाले पात्रोंके चित्रको देव रूपमें न पूजें….
दूधको पांच अमृतोंमेंसे एक कहा गया है । हमने अपने माता-पिताको देखा था कि यदि एक बूंद भी दूध कहीं गिर जाता तो उसे त्वरित हाथसे या वस्त्रसे स्वच्छ करते थे जिससे उसमें किसीका पांव न लगे । जब मैं २००८ में गांवमें दो वर्ष रही तो जो भी ग्वाले दूध देने आते थे, यदि […]
हिन्दू धर्ममें अन्नकी शुचितापर विशेष ध्यान दिया जाता था । आदिकालसे अन्नको उत्पन्न करनेकी कृतिसे लेकर उसे भोजनके रूपमें ग्रहण करनेतक अन्नके ऊपर अनेक संस्कार किए जाते थे, तभी तन और मन दोनों ही पवित्र रहते थे और यह साधनाके लिए पोषक तो था ही, इससे शरीर और मन दोनों ही स्वस्थ रहते थे । […]
आजकल माता-पिता बच्चोंमें स्वाध्यायके या व्यक्तित्व विकासके संस्कार निर्माण ही नहीं करते हैं, बच्चे विद्यालय जाते हैं उसके पश्चात् उन्हें ‘ट्यूशन’ या ‘कोचिंग’ भेज दिया जाता है । मैंने देखा है इसलिए आजकलके बच्चोंमें विद्यालयीन शिक्षासे अर्जित ज्ञानको आत्मसात करना नहीं आता…
आजकल लोग (स्त्री और पुरुष) दोनों ही सुन्दर दिखनेके क्रममें भिन्न प्रकारके कृत्रिम रसायनोंसे बने मुखलेप (फेस क्रीम) लगाते हैं, इससे बाहरसे उनकी त्वचा सुन्दर और आकर्षक दिखती है; किन्तु सूक्ष्म स्तरपर शरीरपर काला आवरण निर्माण हो जाता है…