डॉक्टर, अधिवक्ता, अभियन्ता आदि सब विषयोंके विशेषज्ञ जो कहते हैं, उसे ये बुद्धिवादी लोग आंखें मूंदकर सत्य मानते हैं, परन्तु जब कोई बात अध्यात्मके विशेषज्ञ कहते हैं, तब ये लोग उसका विरोध करते हैं, क्योंकि, उन्हें अहंकार रहता है कि ‘मैं सब जानता हूं ।’
बुद्धिवादियोंमें जिज्ञासा नहीं होती; इसलिए वे, ‘बुद्धिकी समझसे परेकी बातें, उदा. देवता और अनिष्ट शक्तियोंके विषयमें कहते हैं कि ये नहीं होतीं ।’ उनके ऐसा कहनेसे समाजके कुछ लोग ईश्वरसे दूर हो रहे हैं, इसका उन्हें पाप लग रहा है । – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था
निर्गुण ईश्ववरीय तत्त्वसे एकरूप होनेपर ही खरी शान्ति अनुभव कर पाते हैं; ऐसा होते हुए भी शासनकर्ता जनताको साधना न सिखाकर ऊपरी तौरपर मानसिक स्तरके उपचार करते हैं, जैसे जनताकी समस्याएं दूर करनेके लिए ऊपरी प्रयास करना, मनोचिकित्सालय स्थापित करना । परात्पर गुरु डॉ जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था
देशकी प्रगति हो, इसलिए नहीं, तो केवल पुनः चुनाव जीते, इसलिए रातदिन प्रयास करनेवाले राजनितीक दलको जीतानेवाली जनता हेतु ‘भारतकी सभी क्षेत्रमें हुई अधोगति’, यह दण्ड उचित है !
एक साधक : ‘मुझे साधना और सेवामें उत्साह नहीं लगता है तथा इनका महत्त्व घट गया लगता है ।’ परात्पर गुरु डॉ. आठवले : आपके साथ रहनेवाले साधकोंको क्या लगता है ? (उपस्थित साधकोंने बताया कि ‘इनकी साधना अच्छी हो रही है ।’) हमें अपनी साधनाकी स्थिति ठीकसे नहीं समझती, इसके लिए साधकोंको सहसाधकोंसे सहायता […]
‘साधना करनेसे कुण्डलिनी शक्ति जागृत होती है’, यह अभी तकके युगोंमें लाखो साधकोंने अनुभव किया है, परन्तु साधनापर विश्वारस न रखनेवाले अंनिस और बुद्धिप्रमाणवादियोंकी कुछ भी साधना न होते हुए भी बोलते है, कुण्डलिनी दिखाओ, नहीं तो वह नहीं है ! – परात्पर गुरु डॉ जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था साभार : मराठी दैनिक […]
हिन्दुओ, अपना आकाशवाणी (रेडियो स्टेशन) तथा दूरदर्शन केन्द्र (टीवी चैनल) प्रारम्भ करो ! ईसाई तथा इस्लाम पन्थियोंके सैकडों आकाशवाणी तथा दूरदर्शन केन्द्र हैं, जो दिनरात उनके पन्थोंकी सीख देनेके साथ अन्य पन्थोंपर टिप्पणी करते हैं ! हिन्दुओंका एक भी आकाशवाणी अथवा दूरदर्शन केन्द्र नहीं है । हमें अपने आकाशवाणी अथवा दूरदर्शन केन्द्रसे अन्य पन्थियोंपर टीका […]
त्यागका अर्थ वस्तुओंके त्यागसे नहीं अपितु उनके प्रति आसक्तियोंसे है । आरम्भमें शिष्यके पास जो भी वस्तु होता है, गुरु उसका त्याग करवाते हैं और जब आसक्ति नष्ट हो जाती है, तब उन्हें भरपूर देते हैं । चूंकि छत्रपति शिवाजी महाराजको राज्यके प्रति आसक्ति नहीं थी; अतः श्रीगुरुके चरणोंमें अर्पित किया हुआ राज्य, उनके श्रीगुरुने […]
पाश्चात्य देशोंमें गायन तथा नृत्य केवल सुखप्राप्ति हेतु किए जाते हैं । इसके विपरीत भारतमें संगीत एवं नृत्य साधनाकी पद्धति होनेसे ६४ कलाओंके अन्तर्गत आते हैं; अतः संगीत एवं नृत्य साधनामें ध्यानके समान स्थिर न बैठकर भी अर्थात गाते तथा नृत्य करते हुए ध्यान लगता है । भक्तिगीत गायनमें अथवा उसके साथ साथ नृत्य करते […]
दूसरेको स्पर्श होना अपरिहार्य हो, तो नामजप करें ! आजके कालमें ८० प्रतिशत व्यक्तियोंको अनिष्ट शक्तियोंका कष्ट होनेसे दूसरोंका स्पर्श होनेवाला हस्तान्दोलन न कर, नमस्कार करें ! नमस्कारकी मुद्रामें दूसरोंका स्पर्श न होनेसे उनमें स्थित अनिष्ट शक्ति हमारी ओर आकृष्ट नहीं होती है । दूसरोंका केश कर्तन करना, दूसरोंकी मालिश करना, चिकित्सक बनकर दूसरोंकी जांच […]