अध्यात्म

बाहरका भोजन साधकोंने क्यों नहीं करना चाहिए ? (भाग-१)


धर्मप्रसारके मध्य अनेक घरोंमें रहना होता है और इस मध्य मैंने देखा है कि यह जानते हुए भी बाहरका बना हुआ भोजन नहीं करना चाहिए तब भी वे इसे ग्रहण करते हैं; इसलिए यह लेखमाला आरम्भ कर रही हूं । एक सरलसा सिद्धान्त ध्यानमें रखें कि हम जो भोजन ग्रहण करते हैं, वह हमारी स्थूल […]

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वस्त्र धोते समय ध्यानमें रखने योग्य तथ्य !


साधको ! इस ब्रह्माण्डमें खरे सन्तोंकी संख्या नगण्य ही है, ऐसेमें यदि आपको कभी सन्तोंके वस्त्र धोनेका सौभाग्य प्राप्त हो तो उसे अपने हाथोंसे भावपूर्वक धोएं ! सन्तोंकी देहसे स्पर्श होनेके कारण उनके वस्त्रोंमें अत्यधिक चैतन्य होता है, जो उनके वस्त्रमें चला जाता है । उन वस्त्रोंके अधिक समय स्पर्शसे, स्पर्श करने वालेपर आध्यात्मिक उपचार […]

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यदि अपने बच्चेको नृत्य सिखाना ही है तो भारतीय शास्त्रीय नृत्य सिखाएं !


धर्मप्रसारके मध्य मैंने पाया कि एक बच्चेके पालक, उसे आजकी आधुनिक नृत्य शैलीमें नृत्य सिखाने हेतु प्रयासरत थे । वह बच्चा उच्च स्तरका साधक है; इसलिए वह उस शैलीको त्वरित सीख गया; किन्तु आजके आधुनिक शैलीके नृत्यमें सात्त्विकता न होनेके कारण उस बच्चेको कष्ट होने लगा और उसकी ऊंचाई आयु अनुसार बढनी अवरुद्ध हो गई […]

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वाणी, मन एवं काया शुद्धि हेतु क्या करें ?


वाणीकी सिद्धि हेतु सत्यका अनुसरण करना चाहिए । अनेक सिद्धोंको वाक् सिद्धि होती है, यह उनके इस जन्म या पिछले जन्मके धर्मपालन या साधनाका परिणाम होता है । जो भी वचन बोले जाए वे व्यवहारमें पूर्ण हो, वह वचन कभी व्यर्थ न जाए, सदैव सत्य ही बोलना । प्रत्येक शब्दका महत्त्वपूर्ण अर्थ हो, वाक् सिद्धियुक्त […]

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गर्भपात क्यों न करें ? (भाग-४) 


वर्तमान शिक्षा नीतिमें हिन्दुओंको उनके धर्मशास्त्रोंके ज्ञानसे जानबूझकर सोची समझी रणनीतिके अन्तर्गत अनभिज्ञ रखा गया, जिससे वह नाम मात्र हिन्दू रह जाए और वह हुआ भी है; इसलिए आजका हिन्दू शिक्षित तो हो जाता है किन्तु धर्मनिष्ठ नहीं होनेके कारण उसका विवेक जाग्रत नहीं होता है और उससे अनेक बडे अपराध होते हैं, इसी श्रेणीमें […]

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गर्भपात एक महापाप क्यों (भाग-२)


नारद पुराणमें उल्लेखित है कि जो स्त्री गर्भपात करवाती है, वह किसी प्रकारके सम्मान योग्य नहीं होती । इस पुराणके अनुसार महर्षियों और ज्ञानियोंने सभी प्रकारके पाप और कुकर्मोंके लिए प्रायश्चित बताया है; किन्तु जो व्यक्ति गर्भके शिशुको मरवाता है, उसके लिए दण्ड भोगनेके अतिरिक्त कोई मार्ग शेष नहीं बचता । ऐसे व्यक्तिका उद्धार नहीं […]

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वास्तुमें अत्यधिक दोष होनेपर उस वास्तुका त्याग करना ही उचित !


अप्रैल २०१३ में धर्मयात्राके मध्य बंगालके कोलकाता महानगरमें कोलकातामें मेरी सखीके घर जाना हुआ । उसके घर जानेपर मुझे वहां सांस लेनेमें कष्ट होने लगा । सूक्ष्म परीक्षण करनेपर ज्ञात हुआ कि उनके वास्तुमें अत्यधिक कष्ट था, जिसकारण मुझे ऐसा हो रहा था । वे एक वैश्य परिवारसे थीं और उनका वह घर पैतृक घर […]

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गर्भपात एक महापाप क्यों (भाग -१)


वर्तमानकालमें निधर्मी शिक्षण पद्धतिसे शिक्षित दम्पति बिना किसी झिझकके गर्भको चिकित्सकके पास जाकर बिना कोई गम्भीर चिकित्सकीय कारणके उसे नष्ट करवा देते हैं । आजके चिकित्सक भी इसी निधर्मी शिक्षण प्रणालीसे शिक्षित होनेके कारण वे भी ऐसा पाप धनके प्रलोभनमें करते हैं । आजकी युवा पीढी तो बिना विवाहके शारीरिक सम्बन्ध बनानेमें किंचित भी झिझकते […]

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उत्तम सन्तति हेतु गर्भाधान संस्कारका महत्त्व (भाग – ४)


श्रेष्ठ सन्तानकी उत्पत्तिके लिए हमारे मनीषियोंने अपने तपोबलसे प्राप्त ज्ञानद्वारा कुछ धार्मिक कर्म स्थापित किए हैं, जिन्हें हिन्दू धर्मग्रन्थोंमें देखा भी जा सकता है । इन्हीं नियमोंका पालन करते हुए विधिनुसार सन्तानोत्पत्तिके लिए आवश्यक कर्म करना ही गर्भाधान संस्कार कहलाता है । जैसे ही पुरुष व स्त्रीका समागम सफल होता है, जीवकी निष्पत्ति होती है […]

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उत्तम सन्तति हेतु गर्भाधान संस्कारका महत्त्व (भाग – ३)


गर्भस्थापनके पश्चात अनेक प्रकारके प्राकृतिक दोषोंके एवं आनिष्ट शक्तियोंके आक्रमण होते हैं, जिनसे बचनेके लिए यह संस्कार किया जाता है । जिससे गर्भ सुरक्षित रहता है । माता-पिताद्वारा खाये अन्न एवं विचारोंका भी गर्भस्थ शिशुपर प्रभाव पडता है । माता-पिताके रज-वीर्यके दोषपूर्ण होनेका कारण उनका धर्मनिष्ठ न होना, मादक द्र्व्योंका सेवन तथा अशुद्ध खानपान होता […]

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