अध्यात्म

भगवान श्री जगन्नाथजीकी रथयात्रा (भाग – १)


भगवान श्रीजगन्नाथजीकी रथयात्रा आषाढ शुक्ल द्वितीयाको जगन्नाथपुरीमें आरम्भ होती है । यह रथयात्रा पुरीका प्रधान पर्व है । इसमें भाग लेनेके लिए लाखोंकी संख्यामें श्रद्धालु पहुंचते हैं । इस रथयात्रामें भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्राकी मूर्तियोंको तीन पृथक-पृथक दिव्य रथोंपर नगर भ्रमण कराया जाता है । रथयात्रा मुख्य मन्दिरसे आरम्भ होकर दो किलोमीटर […]

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भगवान श्रीकृष्णके विषयमें कुछ तथ्य !


आइए ! सर्वप्रथम जानते हैं कि भगवान श्रीकृष्णको विभिन्न स्थानोंपर किन नामोंसे जाना जाता है : ★ उत्तर प्रदेशमें हम उन्हें कृष्ण, गोपाल, गोविंद इत्यादि नामोंसे ★ राजस्थानमें श्रीनाथजी अथवा ठाकुरजीके नामसे ★ महाराष्ट्रमें विट्ठल ★ उडीसामें जगन्नाथ ★ बंगालमें गोपालजी ★ दक्षिण भारतमें वेंकटेश अथवा गोविंदा ★ गुजरातमें द्वारिकाधीश ★ असम, त्रिपुरा, नेपाल इत्यादि […]

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वेदोंमें मांसभक्षणका निषेध है !


किसी भी सिद्धान्त अथवा किसी भी तथ्यको आंखें बन्दकर मान लेना, बुद्धिमानोंका लक्षण नहीं है । हम वेदोंके सिद्धान्तोंकी पुष्टि, वेदोंके ही साक्ष्यद्वारा करेंगे जिससे हमारी भ्रान्तिका निराकरण हो सके । शङ्का १ : क्या वेदोंमें मांसभक्षणका विधान है ? समाधान : वेदोंमें मांसभक्षणका स्पष्ट निषेध किया गया है । अनेक वेद मन्त्रोंमें स्पष्ट रूपसे […]

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ऋषियोंकी सङ्ख्या सात ही क्यों ?


प्रत्येक कालमें भिन्न-भिन्न सप्तर्षि रहे हैं ।आकाशमें ७ तारोंका एक मण्डल दिखाई देता है, जिन्हें सप्तर्षियोंका मण्डल कहा जाता है । इसके अतिरिक्त सप्तर्षिसे उन ७ तारोंका बोध होता है, जो ध्रुव तारेकी परिक्रमा करते हैं । उक्त मण्डलके तारोंके नाम भारतके ७ महान सन्तोंके आधारपर ही रखे गए हैं । वेदोंमें उक्त मण्डलकी स्थिति, […]

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रामसे बडा रामका नाम क्यों ?


रामराज्यमें हनुमानजी महाराज, भगवान रामकी सेवामें इतने तन्मय हो गए कि गुरु वसिष्ठके आनेका उन्हें ध्यान ही नहीं रहा । सबने उठकर उनका अभिवादन किया; परन्तु हनुमानजी नहीं कर पाए । गुरु वसिष्ठने भगवान रामसे पूछा, “राम ! गुरुका भरी सभामें अभिवादन नहीं कर अपमान करनेपर क्या दण्ड मिलना चाहिए ?” भगवान रामने कहा, “गुरुवर […]

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अन्तर्मुखी साधकोंके लक्षण !

प्रश्न : आपने और आपके साधकोंने अनेक बार ‘अन्तर्मुखता’ इस शब्दका प्रयोग करते हैं यह अन्तर्मुखता क्या होती है ?


उत्तर : अन्तर्मुखी साधकोंके लक्षण :- १. मितभाषी; परन्तु आवश्यकता होनेपर मिलनसार होता है अर्थात जहां वार्ता करनी आवश्यक हो, वहां अवश्य सहजतासे वार्ता करता है । २. किसी भी प्रतिकूल परिस्थितिमें शान्त रहकर उपाय योजना निकलता है । ३. अपनी चूक स्वतः ही स्वीकारकर, उसके लिए वह स्वयं कैसे उत्तरदायी है ? यह चिन्तनकर, […]

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अग्निहोत्रकी भस्मका कैसे करें उपयोग ? (भाग-४)


अग्निहोत्र एवं अग्निहोत्रकी भस्म, दोनों ही पेड-पौधोंके लिए बहुत प्रभावी परिणाम देते हैं । अनेक स्थानोंपर किसान अब खेतके मध्यमें जाकर अग्निहोत्र करने लगे हैं एवं यह कृषकोंमें एक नूतन उत्साह भर देती है । अग्निहोत्रकी भस्मका पौधोंपर कैसे उपयोग करना है ? इसके विषयमें आपको बताते हैं । अग्निहोत्रकी भस्मको एक डिब्बेमें अच्छेसे सम्भाल […]

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अग्निहोत्रकी भस्मका उपयोग कैसे करें ? (भाग-३)


अग्निहोत्रकी भस्मका उपयोग सूक्ष्म सप्तचक्र शुद्धि हेतु किया जा सकता है । इससे सप् चक्रोंमें अनिष्ट शक्तियोंद्वारा जो आवरण निर्मित किया जाता है, वह इसके नित्य उपयोगसे दूर हो जाता है । जिन्हें अधिक शारीरिक एवं मानसिक कष्ट हो, वे इस आध्यात्मिक उपचारको करके देखें, इससे आपको बहुत अधिक लाभ मिलेगा । यह उपचार एक […]

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अग्निहोत्रकी भस्मका उपयोग कैसे करें ? (भाग-२)


अग्निहोत्रकी भस्मको स्नान करते समय भी उपयोग किया करें ! इससे आपपर अनिष्ट शक्तियोंद्वारा नित्य निर्मित किया जानेवाला आवरण नष्ट होगा । इस हेतु आप स्नानगृहमें जहां गोमूत्र और खडा लवण (समुद्री नमक) रखते हैं, वहीं अग्निहोत्रकी भस्म भी एक डिब्बेमें भरकरके रख लें ! स्नानसे पूर्व ‘बाल्टी’में एक चौथाई जलमें एक-एक चम्मच गोमूत्र और […]

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अग्निहोत्रकी भस्मका उपयोग कैसे करें ? (भाग-१)


उपासनाके कुछ साधकोंने नियमित अग्निहोत्र करना आरम्भ किया है । अग्निहोत्रके पश्चात जो भस्म या विभूति बनती है, उसका सदुपयोग कैसे कर सकते हैं ? उसके विषयमें यह लेखमाला है । अग्निहोत्र समाप्त होनेके दो घण्टे पश्चात उसके भस्मको एक डिब्बेमें बन्दकर पूजाघर या किसी स्वच्छ स्थानपर रख दें । रात्रिमें अग्निहोत्रके भस्मको खुला बाहर […]

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