अव्यक्तस्येह विज्ञाने नास्ति तुल्यं निदर्शनम् । यत्र नास्ति पदन्यासः कस्तं विषयमाप्नुयात् ॥ अर्थ : मनु, बृहस्पतिसे कहते हैं – उस अव्यक्त ब्रह्मका बोध करानेके लिए इस संसारमें कोई योग्य दृष्टान्त नहीं है । जहां वाणीका व्यापार ही नहीं है, उस वस्तुको कौन वर्णनका विषय बना सकता है ? ***** नैर्गुण्याद् ब्रह्म चाप्नोति सगुणत्वान्निवर्तते । गुणप्रचारिणी […]
इन्द्रियेभ्यो मनः पूर्वं बुद्धिः परतरा ततः । बुद्धेः परतरं ज्ञानं ज्ञानात् परतरं महत् ॥ अर्थ : मनु, बृहस्पतिसे कहते हैं : इन्द्रियोंसे मन श्रेष्ठ है, मनसे बुद्धि श्रेष्ठ है, बुद्धिसे ज्ञान श्रेष्ठतर है और ज्ञानसे परात्पर परमात्मा श्रेष्ठ है । ***** अवमानेन कुरुते न प्रीयति न हृष्यति । ईदृशो जापको याति निरयं नात्र संशयः ॥ […]
ज्ञानमुत्पद्यते पुंसां क्षयात् पापस्य कर्मणः । यथादर्शतले प्रख्ये पश्यत्यात्मानमात्मनि ॥ अर्थ : मनु, बृहस्पतिसे कहते हैं : पापकर्मोंका क्षय होनेसे ही मनुष्योंके अन्तःकरणमें ज्ञानका उदय होता है । जैसे स्वच्छ दर्पणमें ही मानव अपने प्रतिबिम्बका दर्शन कर सकता है । स्वभावयुक्त्या युक्तस्तु स नित्यं सृजते गुणान् । ऊर्णनाभिर्यथा सूत्रं विज्ञेयास्तन्तौवद् गुणाः ॥ अर्थ : भीष्म, […]
यः कामानाप्नुयात् सर्वान् यश्चैतान् केवलांस्त्यजेत् । प्रापणात् सर्वकामानां परित्यागो विशिष्यते ॥ अर्थ : भीष्म, युधिष्ठिरको बताते हैं : जो मनुष्य अपनी समस्त कामनाओंको पा लेता है तथा जो इन सबका केवल त्याग कर देता है – इन दोनोंके कार्योंमें समस्त कामनाओंको प्राप्त करनेकी अपेक्षा उनका त्याग ही श्रेष्ठ है । न तृप्तिः प्रियलाभेsस्ति तृष्णा नाद्भिः […]
सम्मानश्चावमानश्च लाभालाभौ क्षयोदयौ । प्रवृत्ता विनिवर्तन्ते विधानान्ते पुनः पुनः ॥ अर्थ : भीष्म, युधिष्ठिरसे कहते हैं : सम्मान-अपमान, लाभ-हानि तथा उन्नति-अवनति ये पूर्वजन्मके कर्मोंके अनुसार बार-बार प्राप्त होते हैं और प्रारब्ध भोगके पश्चात निवृत्त हो जाते हैं । सर्वभक्षरतिर्नित्यं सर्वकर्मकरोsशुचिः । त्यक्तवेदस्त्वनाचारः स वै शूद्र इति स्मृतः ॥ अर्थ : भरद्वाज मुनिके द्वारा यह पूछनेपर […]
गुरुभ्य आसनं देयं कर्तव्यं चाभिवादनम् । गुरूनभ्यर्च्य युज्यन्ते आयुषा यशसा श्रिया ॥ अर्थ : भीष्म, युधिष्ठिरसे कहते हैं : गुरुजन पधारें तो उन्हें बैठनेके लिए आसन दे, प्रणाम करे, गुरुओंकी पूजा करनेसे मनुष्य आयु, यश और लक्ष्मीसे सम्पन्न होते हैं । सायं प्रातर्मनुष्याणांशनं वेदनिर्मितम् । नान्तरा भोजनं दृष्टमुपवासी तथा भवेत् ॥ अर्थ : भीष्म, युधिष्ठिरसे […]
तीर्थानां हृदयं तीर्थं शुचीनां हृदयं शुचिः । सर्वमार्यकृतं चौक्ष्यं वालसंस्पर्शनानि च ॥ अर्थ : भीष्म, युधिष्ठिरसे कहते हैं : तीर्थोंमें श्रेष्ठ तीर्थ विशुद्ध हृदय है, पवित्र वस्तुओंमें अतिपवित्र भी विशुद्ध हृदय ही है । शिष्ट पुरुष जिसे आचरणमें लाते हैं, वह आचरण सर्वश्रेष्ठ है । चंवर आदिमें लगे हुए गायकी पूंछके बालोंका स्पर्श भी शिष्टाचारानुमोदित […]
न बुद्धिर्धनलाभाय न जाड्यमसमृद्धये । लोकपर्यायवृत्तान्तं प्राज्ञो जानाति नेतरः ॥ अर्थ : राजा सेनजित एवं ब्राह्मण संवादके अन्तर्गत ब्राह्मण कहते हैं : न तो बुद्धि धनकी प्राप्तिमें कारण है, न मूर्खता निर्धनतामें, वास्तवमें संसारचक्रकी गतिका वृत्तान्त कोई ज्ञानी पुरुष ही जान पाता है, दूसरा नहीं । मृदुना दारुणं हन्ति मृदुना हन्त्यदारुणम् । नासाध्यं मृदुना किंचित् […]
अजानता भवेत् कश्चिदअपराधः कृतो यदि । क्षन्तव्यमेव तस्याहुः सुपरीक्ष्य परीक्षया ॥ अर्थ : विद्वान प्रह्लादजी पौत्र बलिसे क्षमाके विषयमें वर्णन करते हुए कहते हैं : भलीभांति परीक्षण करनेपर यदि यह सिद्ध हो जाए कि अमुक अपराध अज्ञानतामें ही हो गया है; तो उसे क्षमाके ही योग्य बताया गया है ।
तं पुत्रपशुसम्पन्नं व्यासक्तमनसं नरम् । सुप्तं व्याघ्रो मृगमिव मृत्युरादाय गच्छति ॥ अर्थ : भीष्म, ब्राह्मण एवं पुत्र संवादके द्वारा युधिष्ठिरको समझाते हैं । पुत्र कहता है : जैसे सोए हुए मृगको बाघ उठा ले जाता है, उसी प्रकार पुत्र और पशुओंसे सम्पन्न एवं उन्हींमें मनको फंसाए रखनेवाले मनुष्यको एक दिन मृत्यु आकर उठा ले जाती […]