आजके छात्रोंमें दिव्य गुणोंका विकास हो इस हेतु माता-पिता या विद्यालय या शिक्षकगण विशेष प्रयत्न नहीं करते हैं । सभीका एक ही लक्ष्य होता है, पाठ्यक्रमोंके विषयको रटकर परीक्षामें अच्छे अंक लाना, बडे विद्यालय या महाविद्यालयमें प्रवेश पाना……
देहलीमें हुए एक सर्वेक्षणमें ज्ञात हुआ है कि नवरात्रकी समाप्तिके पश्चात अर्थात उसके अगले दिन देहलीमें सबसे अधिक प्रमाणमें मांस, मुर्गा एवं मद्य आदि तामसिक पदार्थोंका विक्रय होता है । नौ दिनोंकी….
आजकी शिक्षाका स्तर इतना गिर गया है कि आजके स्नातक किए हुए विद्यार्थी भी पांच पंक्तियां बिना चूकके अपनी मातृभाषामें नहीं लिख पाते हैं । प्रथम मुझे लगा कि झारखण्डमें ऐसा है, उसके पश्चात उत्तर प्रदेशके युवावर्गके साथ भी मैंने ऐसा ही पाया, तत्पश्चात देहली और अब मध्य प्रदेशकी भी स्थिति ऐसी ही है । […]
दो सहस्र वर्ष पूर्वतक वर्णाश्रम व्यवस्था भारतीय संस्कृतिके मेरुदण्डके (रीढकी हड्डी) समान थी । साम्प्रत (वर्तमान) कालमें धर्मशिक्षणके अभावमें हिन्दुओंने साधना और धर्माचरण करना छोड दिया है; फलस्वरूप आज वर्णाश्रम व्यवस्था टूट चुकी है और चारों ओर अधर्म और सन्ताप बढ गए हैं ।
आजकल अनेक व्यक्ति भोजनको झूठा छोड देते हैं, वह एक प्रकारसे ब्रह्म रुपी अन्नका अपमान करना है । भोजनमें मीनमेख निकालनेसे भी भोजनकी अवमानना होती है, जो प्राप्त हुआ है, उसे कृतज्ञताके भावसे ग्रहण करनेसे भोजनसे सभी देहोंका पोषण होता है…..
मैकाले शिक्षण पद्धति पुरस्कृत बुद्धिवादियोंकी स्थिति देख हंसी आती है, उन्हें सूक्ष्म जगतसे सम्बन्धित कोई बात पचती नहीं है, यदि ऐसे हिन्दुओंको धर्मशिक्षण नहीं दिया गया तो कुछ काल उपरान्त ये हिन्दू अपने पिताका नाम लिखनेसे पूर्व अपना और अपने माता-पिताका ‘डीएनए परिक्षण’ करवाने लगें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए; क्योंकि तपोवृद्ध, वयोवृद्ध, आयुर्वृद्ध एवं […]
हिन्दुओंकी आज मानसिकता ऐसी है कि चाहे पुत्र घरमें निठल्ला बैठा रहे; किन्तु उसने साधना और धर्मकार्य नहीं करना चाहिए, आज धर्मग्लानिका एक मुख्य कारण यह भी है । आज अधिकांश हिन्दू, धर्म हेतु कुछ भी त्याग करनेको तत्पर नहीं होते, उन्हें धर्मसे सब कुछ चाहिए, वह मात्र अपने स्वार्थसिद्धि हेतु धर्मके प्रतीक, देवालयों एवं […]
एक सिक्थ-वर्तिका (मोमबत्ती) जलानेसे और दो मिनट मौन रखनेसे यदि मृत आत्माको शान्ति (गति) मिल जाती तो भगीरथ मुनिको पूर्वजोंकी गति हेतु साठ सहस्र वर्ष तपस्या कर गंगाको पृथ्वीपर क्यों लाना पडता ? वे भी दो मिनट मौन रखते एक सिक्थ-वर्तिका जलाते और उनके सारे पूर्वज शान्त हो जाते !…..
पुत्र अपने पितरोंका ‘पु’ नामक नरकसे रक्षण करता है; इसलिए उसे स्वयं ब्रह्मदेवने ही ‘पुत्र’ कहा है । इस श्लोकके अनुसार पितरोंको सद्गति प्राप्त हो, उन्हें यातनाओंसे मुक्ति मिले व पितृलोकसे पितर अपने वंशपर कृपादृष्टि रखें, इस हेतु पुत्र श्राद्ध आदि विधियां करें । इससे स्पष्ट होता है कि स्वयंको पुत्र माननेवालोंका यह कर्तव्य ही है; किन्तु ‘कलियुगी पुत्र’ अपने हित हेतु सर्व कर्म करता है………
कुछ दिवस पूर्व एक परिचितसे मिलना हुआ । उन्होंने कहा, “मेरी पुत्रीका विवाह निश्चित हो गया है । लडका शासकीय (सरकारी) नौकरी करता है और खाते-पीते घरानेका है और ‘संस्कारी’ भी है । सबसे अच्छी बात है लडकेकी ‘ऊपरी कमाई’ भी है ।” मैंने कहा, “परन्तु ऊपरी कमाई करना तो पाप है ।’ उन्होंने कहा, […]