पाश्चात्यकरणके प्रभावमें आज सभी रंग चुके हैं और विशेषकर भारतीयोंमें एक भ्रांति फैल चुकी है कि जो जितना पाश्चात्य संस्कृति अनुसार वर्तन करेगा, वह उतना ही सभ्य और आधुनिक माना जाएगा ! इस कुत्सित विचारधाराने इस देशकी…..
धर्मशिक्षणके अभावमें आजकल अनेक माता-पिता अपने बच्चोंका पालन-पोषण योग्य प्रकारसे नहीं कर पाते और परिणामस्वरूप उनके बच्चोंको अल्प आयुसे ही अनेक प्रकारके शारीरिक और मानसिक कष्ट…..
आज अनेक पालक अपने बच्चोंको यथोचित समय नहीं दे पाते हैं, कई बार वे व्यस्त रहते हैं और बच्चे उनके कार्यमें व्यवधान न डालें; इसलिए वे बच्चोंको दूरदर्शन संचमें कोई कार्यक्रम देखने हेतु कहते हैं……
आजके अधिकांश माता-पिता अपने बच्चोंको सुसंस्कारित नहीं कर पाते हैं एवं जब वे बच्चे थोडे बडे होने लगते हैं तो उन्हें (माता-पिताको) उनके दुर्गुण कष्ट देने लगते हैं और वे उन्हें कोसने लगते हैं या उनके दुर्गुणोंसे दुखी हो जाते हैं…….
साधनाका संस्कार बाल्यकालमें नहीं, अपितु गर्भकालमें डालना चाहिए तभी गर्भस्थ शिशुमें तेजस्विता निर्माण हो सकती है, किन्तु विडम्बना तो देखें, आजके अधिकांश माता-पिता इस दिशामें कोई प्रयत्न नहीं करते हैं ! इसलिए ऐसी सन्तानोंसे….
जो भी स्त्री लोक-लाजका त्याग कर अंग प्रदर्शन कर अन्योंमें वासनाको जागृत करती हैं, वे महापापकी अधिकारिणी होती हैं । स्त्रियोंका नैसर्गिक अलंकार उनकी स्त्री-सुलभ लज्जा है, यदि वह समाप्त हो गया, तो समझ लें सब कुछ समाप्त हो गया ! पिछले कुछ दशकोंका इतिहास साक्षी है, अधिकांश अंग-प्रदर्शन करनेवाली चलचित्र एवं मॉडलिंग जगतकी भारतीय […]
जान बूझकर किया गया पाप-कर्म होता है, अक्षम्य पाप ! अपनी आनेवाली पीढीको सर्व सुख-सुविधा मिले, इस हेतु आज अनेक पालक (माता-पिता, आज स्त्रियां भी भ्रष्टाचार करनेमें पीछे नहीं हैं) भ्रष्टाचार करते हैं, उन्हें यह ज्ञात होना चाहिए कि अधर्मका आधार लेकर एकत्रित किया गया धन, कभी भी किसीको सुख नहीं दे सकता है; इसके विपरीत ऐसा […]
धर्म, साधना और नैतिकता नहीं सिखाए जानेके कारण आज समाज अपने कर्मोंको निष्ठासे नहीं करता है ! अर्थात उससे कर्तव्यपालनतक ठीकसे नहीं होता है ! उदाहरण तो इतने हैं कि उसे लिखना सम्भव नहीं, जैसे – न्यायाधीश अर्थात न्यायका अधीश……
आजकल विवाह हेतु बैठनेवाले जोडे अज्ञानताके कारण तमोगुणी वस्त्र पहनकर विवाह करते हैं । विवाह एक महत्त्वपूर्ण सोलह संस्कार रुपी यज्ञकर्म है, उसे जितनी अधिक सात्त्विकतासे एवं श्रद्धाभावसे किया जाए, उसका उतना ही अधिक……
विवाह एक यज्ञ कर्म है; अतः उसके अंतर्गतकी जानेवाली धार्मिक विधियोंको श्रद्धापूर्वक करने पर अधिक महत्त्व देना चाहिए, इससे पति-पत्नीमें मानसिक और आध्यात्मिक एकरूपता साध्य होनेमें सहायता मिलती है जिससे उच्च कोटिके जीवात्माओंका उनके माध्यमसे जन्म होता है एवं उनका वैवाहिक जीवन आध्यात्मिक प्रगति हेतु पूरक होता है । इसके विपरीत, आजके विवाहने एक बाह्य […]