समाचार सूत्रोंके अनुसार वियतनाममें नवीं शताब्दीका शिवलिंग मिला है । भारत ही नहीं विश्वके एक बडे भूभागमें हिन्दू संस्कृति और सभ्यता विद्यमान थी; किन्तु मात्र हिन्दुओंकी अकर्मण्यताके कारण हिन्दुओंका यह साम्राज्य अब भारतमें संकुचित होता जा रहा है । हिन्दुओ, अब तो जागो अन्यथा आनेवाली पीढी हमें कभी क्षमा नहीं करेगी !
आजकल अंग्रेजीका एक शब्द आधुनिक बने हिन्दुओंमें भी प्रचलित हो गया है और वह है “मुझे स्पेस चाहिए !” वस्तुत: इसका अर्थ है मेरे अहंकारको मत छेडो ! मैं जैसा हूं/जैसी हूं, वैसा ही रहने दो ! अब तो यह पति-पत्नी, भाई-बहनमें भी प्रचलित हो गया है । महानगरोंमें ‘स्पेस’का यह महारोग, महामारीके रूपमें फैल […]
मैंने पाया है कि जैसे आजकी अनेक स्त्रियां अपने ससुरालवालोंसे स्नेह नहीं करती हैं और उनसे अपने पतिको भी दूर रखती हैं, वैसे ही आज अनेक सास-ससुर भी जैसा वर्तन अपनी पुत्री समान पुत्रवधूसे करना चाहिए, वैसा नहीं करते हैं । और यदि विवाहके आरम्भमें ही कुछ बहुत पीडादायक प्रसंग घटित हो जाए तो ऐसी […]
धर्मप्रसारके मध्य मेरा सुदूर पहाडी क्षेत्रोंमें भी जाना हुआ है और मैंने पाया कि वहांका जीवन समतल क्षेत्रोंमें (नदियोंके तटीय क्षेत्रोंमें) रहनेवालेकी अपेक्षा अधिक चुनौतीपूर्ण एवं कठिन होता है; किन्तु वे अपने कठोर परिश्रम, धर्मपालन एवं साधनासे वहां भी आनन्दी रहते हैं; किन्तु जब ये लोग महानगरोंमें आ जाते हैं तो वे […]
कोरोनाने इस देशको बहुतसे कटु सत्यसे परिचय कराया है, जैसे इस गृहबन्दीके समय १७५००० बच्चोंका जन्म हुआ है जिसमेंसे ९६% का सामान्य प्रसवके माध्यमसे हुआ है और मात्र ४% का शल्यक्रियाके माध्यमसे हुआ है । इससे समझमें आता है कि आज चिकित्सकीय क्षेत्रमें भी नैतिकताका कितना पतन हुआ है ?
कोरोना प्रकोपके कारण विश्वके २५ कोटि जनसंख्या भुखमरीसे आज त्रस्त है ! अभी तो मात्र तीन माह ही हुए है इस रोगको और कोई भी कह नहीं सकता है कि इसका अंत कब होगा ? इस आपातकालकी पूर्वसूचना देते हुए संत कहते थे कि अन्नका एक कण भी व्यर्थ नहीं करना चाहिए; किन्तु तब भी […]
पूर्वकालके लोग कितने समझदार होते थे; अपने छोटेसे छोटे घरमें भी पूरे वर्षका अनाज एकत्रित कर रखते थे और मैंने देखा है कि आज भी भारतका कृषक वर्ग अपने घरमें अपने हाथसे उपजाए अन्नको सम्पूर्ण वर्षके लिए रखकर ही उसे बेचते हैं ! अर्थात आजेके पढे-लिखे लोगोंसे, ये लोग अधिक बुद्धिमान व दूरदर्शी होते हैं […]
हमने आपको बताया था कि हमारे श्रीगुरुने जनवरी १९९९ में हमें बताया था कि ऐसा काल आयेगा कि लोग अपने परिजनोंकी अन्त्येष्टि भी नहीं कर पायेंगे; किन्तु यहां तो स्थिति और भी विषम है ! समाचार पत्रोंमें वृत्त प्रकाशित हो रहा है कि घरके सदस्य कोरोना पीडित सदस्यकी मृत्यु होनेपर उनकी अंत्येष्टि तो क्या उनके […]
आजकल मैंने देखा है कि कुछ युवकोंको चाकरी नहीं मिलती है या वे प्रतिस्पर्धावाले परीक्षामें उत्तीर्ण नहीं होते हैं तो वे वृत्तिहीन (बेरोजगार) होकर घर बैठे रहते हैं , या वे प्रतिस्पर्धा हेतु पढाई कर रहे हैं यह कहकर तीस वर्षकी आयुतक …..
अमेरिकाके लोग अपने देशमें चल रहे गृह-बंदीके (लॉकडाउनके) विरोधका समाचारके विषयमें जानकर आश्चर्य हो रहा है ! इसे ही संभवत: बुद्धिभ्रष्टता कहते हैं ! जिस देशमें प्रतिदिन सहसों लोग कोरोनाके ग्रास बनकर मृत्युको प्राप्त हो रहे हैं; उस देशके लोगोंके अपने भलेके लिए लगा गृह-बंदीका विरोध करना, यह बताता है कि वे कितने भोगवादी है […]