धर्मका महत्त्व

अविज्ञाय नरो धर्मं दुःखमायाति याति च ।
मनुष्य जन्म साफल्यं केवलं धर्मसाधनम् ॥
अर्थ : धर्मको न जानकर मनुष्य दुःखी होता है । धर्मका आचरण करनेसे ही मनुष्य जन्म यशस्वी होता है ।

 

 

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विगत कुछ वर्षोंसे हमारे जालस्थलके कई पाठकों, विभिन्न गुरुओंके शिष्यों तथा अनुयायियों एवं अन्य जिज्ञासुओंने अपनी भौतिक, व्यावहारिक तथा आध्यात्मिक समस्याओंके समाधानके सम्बन्धमें पूछा है | हमने पाया है कि समाजमें कई लोगोंको व्यक्तिगत स्तरपर ऐसी समस्याओंके मार्गदर्शन तथा परामर्शकी आवश्यकता होती है | उनकी इसी आवश्यकताको दृष्टिगत रखते हुए हमारी संस्थाने 'उपासना आध्यात्मिक उपाय एवं मार्गदर्शन केन्द्र'की स्थापनाकी है | इस केन्द्रके माध्यमसे ऐसी समस्याओंके मूल आध्यात्मिक कारणोंका विश्लेषणकर योग्य परामर्श प्रदान किया जाता है | इस सम्बन्धमें विस्तृत जानकारीके लिए आप हमें सम्पर्क कर सकते हैं  !
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सर्व पंथ एवं सम्प्रदाय ऐसे तथाकथित आधुनिक वैद्यों समान हैं, जिन्हें एक ही औषधि ज्ञात हो । वे केवल एक ही प्रकारकी साधना बताते हैं । इसके विपरीत धर्म, जितने व्यक्ति उतनी प्रकृति, उतने साधना मार्ग इस तत्त्वानुसार साधना बताता है । – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले

उपासना कार्य

सात्त्विक जप

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मां दुर्गाका जप – ॐ श्री दुर्गा देव्यै नमः

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शिवजीका जप – ॐ नमः शिवाय

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दत्तात्रेय देवताका जप – ॐ श्री गुरुदेव दत्त

नियमित स्तम्भोंसे सम्बन्धित लेख

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वज्रासन, सुखासन या पद्मासनमें बैठ कर, अनामिका अंगुलीके अग्र भागसे लगाकर रखनेसे पृथ्वी मुद्रा बनती है । इस मुद्राको करते समय हाथकी शेष अंगुलियोंको सीधी रखें ! वैसे तो पृथ्वी मुद्राको किसी भी आसनमें किया…..

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आगामी आपातकालकी दृष्टिसे यदि प्रत्येक ग्राम एवं उपमंडल(कस्बेमें) ऐसे साधक हों, जिनकी सूक्ष्म इन्द्रियां जागृत हों, इस उद्देश्यसे यह उपक्रम आरम्भ किया गया है ।

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